“IVF क्या है, और क्या हमारे लिए यही आखिरी रास्ता है?” मेरे क्लिनिक में यह सवाल अक्सर उम्मीद और घबराहट के साथ आता है। परिवार का दबाव, हर महीने इंतज़ार और इंटरनेट की अलग-अलग सलाह उलझन बढ़ा सकती है। मैं डॉ. मुनव्वर सना, Apollo Fertility, Kondapur, Hyderabad में फर्टिलिटी और मेनोपॉज़ विशेषज्ञ हूँ। मेरी पहली कोशिश यही रहती है कि आप इलाज को समझें, सवाल पूछें और बिना दबाव फैसला लें।
IVF क्या है और कब इसकी ज़रूरत पड़ सकती है?
IVF का पूरा नाम इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन है। इसमें अंडाणु और शुक्राणु को शरीर के बाहर लैब में मिलाया जाता है। निषेचन से बना शुरुआती भ्रूण कुछ दिन विकसित होने के बाद गर्भाशय में रखा जाता है। इसे एम्ब्रियो ट्रांसफर कहते हैं। इसके बाद भ्रूण गर्भाशय की परत से जुड़ जाए, तभी गर्भावस्था आगे बढ़ती है। IVF इस संभावना में मदद करता है, लेकिन गर्भधारण की गारंटी नहीं देता।
दोनों फैलोपियन ट्यूब बंद या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हों, तो IVF उपयोगी हो सकता है। ये ट्यूब अंडाणु और शुक्राणु के मिलने का सामान्य रास्ता हैं। शुक्राणुओं की संख्या या गुणवत्ता में गंभीर समस्या, कुछ मामलों में एंडोमेट्रियोसिस, या दूसरे उपचारों के बाद भी गर्भ न ठहरने पर भी मैं IVF पर चर्चा करती हूँ। कभी उम्र और उपलब्ध समय को देखते हुए इसे जल्दी चुनना उचित होता है।
हर PCOS या कम AMH रिपोर्ट का मतलब IVF नहीं है। AMH अंडाशय में बचे अंडाणुओं के भंडार और दवाओं के प्रति संभावित प्रतिक्रिया का संकेत देता है; यह अकेले अंडाणुओं की गुणवत्ता या प्राकृतिक गर्भधारण की संभावना तय नहीं करता। कुछ लोगों के लिए ओव्यूलेशन, यानी अंडाणु निकलने का उपचार, या IUI पर्याप्त हो सकता है। IUI में तैयार किए गए शुक्राणु गर्भाशय में डाले जाते हैं।
आमतौर पर 35 वर्ष से कम उम्र में एक साल कोशिश के बाद और 35 या उससे अधिक में छह महीने बाद जाँच करानी चाहिए। 40 से अधिक उम्र, बहुत अनियमित माहवारी, ज्ञात ट्यूब की समस्या या पुरुष साथी की फर्टिलिटी संबंधी समस्या हो तो पहले सलाह लें। जाँच दोनों साथियों की होती है; गर्भधारण में देरी को सिर्फ महिला की जिम्मेदारी मानना गलत है।
IVF से पहले की जाँच और इलाज के चरण
पहली मुलाकात में मैं माहवारी, पिछली गर्भावस्था, ऑपरेशन, दवाओं और कोशिश की अवधि के बारे में पूछती हूँ। ज़रूरत के अनुसार अल्ट्रासाउंड, AMH या दूसरे हार्मोन टेस्ट, वीर्य की जाँच और गर्भाशय या ट्यूब का मूल्यांकन किया जाता है। हर व्यक्ति को हर टेस्ट की आवश्यकता नहीं होती। पुरानी रिपोर्ट साथ लाने से अनावश्यक जाँच दोहराने से बचने में मदद मिलती है।
IVF की शुरुआत में अंडाशय में कई अंडाणु विकसित करने के लिए हार्मोन के इंजेक्शन दिए जाते हैं। अल्ट्रासाउंड और कभी खून की जाँच से उनकी बढ़त देखी जाती है। फिर सही समय पर, बेहोशी या दर्द कम करने की व्यवस्था के साथ, अंडाणु निकाले जाते हैं। दवाओं की मात्रा और समय आपकी स्थिति के अनुसार तय होते हैं, किसी परिचित की पर्ची देखकर नहीं।
लैब में अंडाणुओं को शुक्राणुओं के साथ रखा जाता है। कुछ स्थितियों में ICSI तकनीक से एक शुक्राणु सीधे अंडाणु में डाला जाता है; यह हर IVF में अनिवार्य नहीं है। विकसित भ्रूणों में से उपयुक्त भ्रूण ट्रांसफर किया जाता है। कभी सुरक्षा या बेहतर समय के लिए भ्रूण फ्रीज़ करके ट्रांसफर बाद में किया जाता है। बचे हुए उपयुक्त भ्रूण भी सहमति से सुरक्षित रखे जा सकते हैं।
ट्रांसफर के बाद सहायक दवाएँ और निर्धारित दिन गर्भावस्था की जाँच होती है। बहुत जल्दी घर पर टेस्ट करने से भ्रम हो सकता है। हर अंडाणु से भ्रूण नहीं बनता और हर भ्रूण गर्भाशय में नहीं जुड़ता। इसलिए मैं शुरुआत में ही समझाती हूँ कि इलाज के दौरान योजना बदल सकती है और कभी एक से अधिक प्रयास पर चर्चा करनी पड़ सकती है।
सफलता, जोखिम और खर्च को कैसे समझें?
IVF का परिणाम उम्र, अंडाणु और शुक्राणु की गुणवत्ता, गर्भाशय की स्थिति और गर्भधारण में देरी के कारण पर निर्भर करता है। क्लिनिक की कोई एक सफलता दर आपका व्यक्तिगत परिणाम नहीं बताती। मैं सलाह देती हूँ कि केवल पॉज़िटिव टेस्ट नहीं, बल्कि जीवित बच्चे के जन्म की संभावना और अपने मामले की सीमाओं के बारे में पूछें। असफल प्रयास किसी की गलती नहीं है।
इलाज में पेट फूलना, इंजेक्शन की जगह दर्द और भावनात्मक थकान हो सकती है। कभी अंडाशय की जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया, यानी OHSS, या अंडाणु निकालने से जुड़ी जटिलताएँ हो सकती हैं। तेज पेट दर्द, लगातार उल्टी, साँस फूलना या पेशाब कम होना हो तो तुरंत क्लिनिक से संपर्क करें। एक से अधिक भ्रूण रखने पर जुड़वाँ गर्भ और उससे जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं; इसलिए भ्रूण की संख्या सोच-समझकर तय होती है।
खर्च दवाओं, जाँच, लैब प्रक्रिया, ICSI की आवश्यकता, भ्रूण फ्रीज़ करने, स्टोरेज और बाद के ट्रांसफर पर बदलता है। पैकेज में क्या शामिल नहीं है, यह भी पूछें। हर अतिरिक्त प्रक्रिया सबके लिए जरूरी नहीं होती। मैं परामर्श और रिपोर्ट की समीक्षा के बाद व्यक्तिगत अनुमान समझाती हूँ, ताकि परिवार अपनी आर्थिक तैयारी स्पष्ट जानकारी के साथ कर सके।
IVF से जुड़े मिथक और सच्चाई
मिथक: IVF से हमेशा जुड़वाँ बच्चे होते हैं। सच्चाई: ऐसा जरूरी नहीं है। एक भ्रूण ट्रांसफर करने से कई बच्चों वाली गर्भावस्था का जोखिम कम करने में मदद मिलती है। मिथक: IVF के बच्चे हमेशा अस्वस्थ होते हैं। सच्चाई: अधिकांश बच्चे स्वस्थ होते हैं, हालांकि कोई भी गर्भावस्था पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं होती और नियमित निगरानी जरूरी है।
मिथक: ट्रांसफर के बाद लगातार बिस्तर पर रहना चाहिए। सच्चाई: सामान्य हल्की गतिविधि आमतौर पर सुरक्षित होती है; व्यक्तिगत सावधानियाँ अलग हो सकती हैं। मिथक: अनानास, घी या कोई खास नुस्खा भ्रूण को चिपका देता है। सच्चाई: इसका भरोसेमंद प्रमाण नहीं है। पूजा, दुआ या ध्यान से मन को सहारा मिले तो जारी रखें, लेकिन दवाओं और चिकित्सकीय निगरानी के विकल्प के रूप में नहीं।
मुख्य बातें: शरीर और मन, दोनों का खयाल
मेरे 360° दृष्टिकोण में वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित चिकित्सा के साथ पोषण, अनुकूल योग और जीवनशैली की देखभाल शामिल है। संतुलित खाना, नींद, तंबाकू से दूरी और सुरक्षित गतिविधि स्वास्थ्य में मदद करते हैं; ये IVF की सफलता की गारंटी नहीं हैं। सास-ससुर या दूसरे रिश्तेदारों को कितना बताना है, यह आपका निर्णय है। साथी का साथ और जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग भी महत्वपूर्ण हैं।
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References & clinical guidelines
- Indian Council of Medical Research — National ART Guidelines and the ART (Regulation) Act, 2021
- ESHRE — European Society of Human Reproduction and Embryology, clinical practice guidelines
- NICE CG156 — Fertility problems: assessment and treatment
- Royal College of Obstetricians and Gynaecologists — patient information and guidelines



